भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मेरा बस्ता / रमेश तैलंग

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मेरा बस्ता
जैसे भानमती का एक पिटारा ।

एक नहीं, दो नहीं,
क़िताबें उसमें रहतीं चार ।
उनके साथ कापियाँ,
स्याही, पेन, सभी का भार ।
लटकाते-लटकाते कन्धा दुखने लगता सारा ।

लंच-बाक्स भी तो
उसके अन्दर ही रखना पड़ता ।
थक जाती हैं टाँगें
जब भी जल्दी चलना पड़ता ।
हाय ! पढ़ाई का हो पाता बस्ते बिना गुज़ारा ।