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यदि आप / संध्या गुप्ता

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यदि आप मेरे घर को
चारों ओर दीवारों से घेर देंगे
खिड़कियों दरवाजों रोशनदानों
को रुंध देंगे और खुद
स्वच्छंद विचरण करेंगे
तो आखि़रकार मैं सेंधमारी ही करूंगी

क्योंकि आपके घर में
घुसपैठिया भिखारन या दासी बनकर रहना
मुझे कतई स्वीकार नहीं!

डोर से नकेल तक...
मैं यह नहीं जानती कि पतंग का जन्म कैसे हुआ
यह भी नहीं कि इसका जन्मदाता कौन था
और यह भी नहीं कि इस खेल में आखि़र उसे
किस तरह का आनंद मिला होगा

लेकिन जब भी कभी मैं पतंग को आकाश में उड़ते देखती हूं
तो कैसे भी करके मन में उठने वाले इस विचार को
टाल नहीं पाती कि जरूर अपनी उंगलियों के
इशारों पर नचाने की प्रवृत्ति का ही परिणाम है
यह पतंग

जब मैं पंछी और पतंग दोनों को साथ-साथ
उड़ते देखती हूं तो सोचती हूं पंछी को
मालूम है उसका ठिकाना
उसे खुद ही तय करनी है अपनी मंजिलें
अपनी दिशाएं और राहें
शाम होते ही उतर आना है उसे अपने नीड़ में
फिर कल सुबह की ताजा उड़ान के लिए

पंछी अपनी हर उड़ान में आजाद है बिलकुल
लेकिन पतंग की डोर तो किसी और के हाथों है
वह उसे चाहे जब तक और चाहे जैसे नचाए
तब मैं उस व्यक्ति को देखती हूं जो आकाश की
बुलंदियों पर है लेकिन उसकी नकेल किसी और के
हाथ में...तो, उस व्यक्ति और पतंग में मुझे
कोई फर्क नहीं दिखता

पतंग तो पतंग लेकिन वह आदमी क्यों
अपनी इच्छाओं के विरुद्ध उन आदेशों का
पालन करने को प्रस्तुत है जिनसे वह खुद
कतई सहमत नहीं!...जो उसकी आजादी पर
एक बहुत बड़ा सवालिया निशान है!

पतंग और पंछी के बीच मेरी कल्पना में
एक ऐसा आदमी उतर कर आता है
जिसने डोर से नकेल तक की राजनीति को
जन्म दिया है
वह निश्चित रूप से कोई ख़तरनाक इरादों वाला
ही रहा होगा...
लेकिन मैं उसकी शिनाख़्त अभी
ठीक-ठीक कर पाने में असमर्थ हूं!

कल्पना के स्थापत्य में जीवन की इच्छा

चलो लौटती हूं
उस निर्जन मकान में तुम्हारे साथ

यहां कल्पना में जलाओ स्टोव
या फिर मैं लकड़ियों का इंतजाम करती हूं

एक सीढ़ी लगाकर इस मोटी दीवार के उस पार देखना
कैसा रहेगा

चलो! यहां आओ, बैठो!
मेरी गोदी में सिर रखो
अब यहां से दूर जाती सड़क को देखो

यहां हवा कुछ दूसरी तरह से त्वचा का स्पर्श
करती है
यहां अन्न का स्वाद कुछ भिन्न है

पानी का स्वाद भी पूर्व परिचय का नहीं
देखो, धूप का यह रंग कैसा है!

यहां कोई सितार बजाकर उठा है अभी... सुनो!!

जलते हुए इस अलाव की लपट में किस संगीत का
असर है

इस स्थापत्य में कहीं कुछ छूट रहा है
आओ इसके अंदर प्रवेश करते हैं हम तुम

जैसे ओस फूल में!