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यह लो मेरे हस्ताक्षर / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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बस, यह ठीक है
बस, अब-
दृश्य यही रहने दो, मेरी आँखों के सामने,
मुझे बड़ा सुख मिल रहा है!

आज कल नहीं भा रहा है मुझे
रहस्य-गर्भ क्षितिजों की ओर बढ़ती
आश्विन-कार्तिक की-
सौम्य-सुशील सरिताओं का
चन्द्र-तारकांकित, स्निग्ध-स्वच्छ समतल-सा जल-प्रसार!

सावन-भादों के मेघ-घुमड़नों की छाया में,
चारों ओर के पहाड़ों से
हरहराती-दहाड़ती-उतरती,
आवर्तांे-विवर्तों में फुफकारतीं,
ताबड़तोड़, प्रमदा, मटमैली जलधाराओं का
रोर-भरा गर्जन-तर्जनमय यह संगम ही मुझे प्रिय है-
जिसमें पहाड़ों की गेरुएँ, गन्धक, शिलाचूर्ण,
टूटे डाल-पात, कण्टक, चट्टान, पत्थर, शिखर-खण्ड
ढहते-बहते चले आ रहे हैं!

क्या ही दृश्य है-
अहा, आज के कवि की चेतना का प्रतिरूप!
बस, ऐसी ही
हाँ, ऐसी ही
बहने दो आज के कवि की चेतना-
आक्रोश, विद्रोह, फंुकार व झुँझलाहटों-भरी!

सरस, स्निग्ध, सौम्य व सुषमावान्-
अब बड़े कुरूप हो उठे हैं मेरी आँखों के लिए!
अब मुझे पुरुष, भदेस, अनगढ़
का रूप, यौवन और सौन्दर्य
निर्निमेश निहार लेने दो!
आह, कहाँ छिपा था अब तक यह!

क्रांति की प्रचण्ड ठोकर से
तोड़ दो व्यवस्था के इस बर्फ़ की जड़ चट्टान को-
जिसमें कि मनुष्यता का
सनातन स्वर चिर बंदी पड़ा है-लुंठित!

सृष्टि जड़ पड़ी है!
उठने दो काली-पीली आँधियाँ,
गिरने दो गाज और ढहने दो शिखर,
सजे हुए मंचों के नेपथ्यों को फोड़ दो,
उनका शासन असह्य हो उठा है!
मचने दो क्रांतियाँ!
भूचाल लाओ, ठोकरें मारो,
अन्याय के विरुद्ध आबाजें लगाओ,
आकाश में दरारें डाल दो,
आज ध्वंस के लिए मेरी पूरी स्वीकृति है!
उड़ने दो पत्ते और टूटने दो डालियाँ,
चरमराने दो तने, उन्मूलित होने दो जड़ें-
तमोमयी सत्ता की, व्यवस्था की;

ध्वंस के लिए आज मेरी पूरी स्वीकृति है-
यह लो मेरे हस्ताक्षर!