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यार के धोके में फिर से आ गईं तनहाइयाँ / प्रणव मिश्र 'तेजस'

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यार के धोके में फिर से आ गईं तनहाइयाँ।
देखते ही देखते पगला गईं तनहाइयाँ।

हुस्न का ये रंग हमने तो कभी देखा नहीं।
नूर छलका नूर से ललचा गईं तनहाइयाँ।

ज़िक्र अपना जब चमन में छेड़ती बादे-सबा।
धड़कनों के शोर से घबरा गईं तनहाइयाँ।

ज़ख्म खाकर फिर वही उम्मीद तुझसे ऐ ! निगाह।
तू न बदलेगी कभी समझा गईं तनहाइयाँ।

मैकदों में सुन रहें हैं जोर है इस बात पर।
मैकशों की चाल पर इठला गईं तनहाइयाँ।

राह जब हो इश्क़ की, हो हमसफ़र भी बेवफ़ा।
आशिकों के तब दिलों पर छा गईं तनहाइयाँ।

ज़ुल्मतों की ख़ाक तेजस ख़्वाब पर पड़ने लगी।
गुनगुनाती नींद से घबरा गईं तनहाइयाँ।