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यार था गुलज़ार था बाद-ए-सबा थी / ज़फ़र

यार था गुलज़ार था बाद-ए-सबा थी मैं न था
लायक़-ए-पा-बोस-ए-जाँ क्या हिना थी, मैं न था

हाथ क्यों बाँधे मेरे छल्ला अगर चोरी हुआ
ये सरापा शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना थी, मैं न था

मैंने पूछा क्या हुआ वो आप का हुस्न्-ओ-शबाब
हँस के बोला वो सनम शान-ए-ख़ुदा थी, मैं न था

मैं सिसकता रह गया और मर गये फ़रहाद-ओ-क़ैस
क्या उन्हीं दोनों के हिस्से में क़ज़ा थी, मैं न था