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युग आयेंगे! / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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युग आयेंगे!
जीवन की उजड़ी घाटी में मधुज्वार वसन्ती लायेंगे!
युग आयेंगे!
जग-तरु की डालों में कुसुमित-
नर-नारी-चिड़ियों से पुलकित-
जीवन की शरद्-जुन्हाई में कंचन का नीड़ बसायेंगे!
युग आयेंगे!
नयनों में ले सतरँग सपने-
नारी-नर हंसी-हंस बने-
जीवन के मानसरोवर में मन के मोती चुग पायेंगे!
युग आयेंगे!
सब तोड़ लकीरें भौगोलिक,
मानव, निज ज्योति लिये मौलिक-
स्वच्छन्द सितारों-से झल्मल, सह-गान धरा पर गायेंगे!
युग आयेंगे!
नव नील झील-सी धरती पर
जन विचरेंगे, ज्यों मुक्त लहर;-
सब चन्दा के चुम्बन पा कर, संगीत-भरे लहरायेंगे!
युग आयेंगे!