यूँ ही नहीं सुर्ख़़ हैं
ये चटख़ी हुई,
दिल्ली की चट्टानें !
नहाई है लहू में,
सुलगती रहीं युद्धों में
न जाने कब से...
कितनी बार...
यूँ ही नहीं सुर्ख़़ हैं
ये चटख़ी हुई,
दिल्ली की चट्टानें !
नहाई है लहू में,
सुलगती रहीं युद्धों में
न जाने कब से...
कितनी बार...