भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

ये घर बनाने वाले / रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


बेघर सदा रहे हैं
ये घर बनानेवाले ।
तारों की छत खुली है
धरती बनी बिछौना
इस बेरहम शहर में
मस्ती में डूब सोना
अँधेरों में गा रहे
दीया जलानेवाले ।
शिखर नभ को छू रहे हैं
सुख से हैं अघाए
किसका बहा पसीना
ये कभी न जान पाए ।
लू के थपेड़े खाकर
छाँव दिलाने वाले ।
आज हैं यहाँ पर -
कल कहीं और है ठिकाना
बची है साँस जब तक
गैरों के घर बसाना ।
सोएँगे नींद गहरी
न जाग पाने वाले ।
-0-
26 अप्रैल, 2010