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ये चाहती थी के घर यूँ पिया के जाऊँ मैं / बेगम रज़िया हलीम जंग

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ये चाहती थी के घर यूँ पिया के जाऊँ मैं
चुनर मैं ओढूँ तेरी और हिना लगाऊँ मैं

लगाऊँ ख़ाक-ए-मदीना का सुर्मा आँखों में
हरे लिबास से अपना बदन सजाऊँ मैं

के जैसे कोई घुमाता है हाथ में कंगन
तेरे दुरूद की तस्बीह यूँ घुमाऊँ मैं

हज़ारों क़ुमक़ुमें रौशन वहाँ पें होंगे मगर
बना के दिल को दिया रौज़े पे जलाऊँ मैं

ये नूर नूर निगाह-ए-करम इधर कर दो
मेरे हुज़ूर है उजलत के बुझ न जाऊँ मैं