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ये फ़ासले भी, सात समन्दर से कम नहीं / 'अना' क़ासमी

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ये फ़ासले भी, सात समन्दर से कम नहीं,
उसका ख़ुदा नहीं है, हमारा सनम नहीं ।

कलियाँ थिरक रहीं हैं, हवाओं के साज़ पर,
अफ़सोस मेरे हाथ में काग़ज़-क़लम नहीं ।

पी कर तो देख इसमें ही कुल कायनात है,
जामे-सिफ़ाल[1] गरचे मिरा जामे-जम[2]नहीं ।

तुमको अगर नहीं है शऊरे-वफ़ा तो क्या,
हम भी कोई मुसाफ़िरे-दश्ते-अलम[3] नहीं ।

टूटे तो ये सुकूत[4] का आलम किसी तरह,
गर हाँ नहीं, तो कह दो ख़ुदा की क़सम, नहीं ।

इक तू, कि लाज़वाल[5] तिरी ज़ाते-बेमिसाल,
इक मैं के जिसका कोई वजूदो-अ़दम[6] नहीं ।

शब्दार्थ
  1. मिट्टी का प्याला
  2. जमशेद बादशाह का, वो प्याला जिसमें वो सारा संसार देखता था
  3. मुसीबतों के जंगल का राही
  4. ख़ामोशी
  5. अमिट
  6. अस्तित्व एवं नश्वरता