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ये शहर शहर सर-ए-आम अब मुनादी है / मनमोहन 'तल्ख़'

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ये शहर शहर सर-ए-आम अब मुनादी है
न वो रहेगा मुलाक़ात का जो आदी है

ज़मीन दी है खुली धूप दी हवा दी है
ब-नाम-ए-ज़िंदगी कैसी कड़ी सजा दी है

मैं अपने आप से क्या पूछता हूँ रह रह कर
ये क्यूँ लगे के किसी ने मुझे सदा दी है

तेरा ही रूप कोई था यहाँ जब आया था
ये देख वक़्त ने अब शक्ल क्या बना दी है

दुआ सलाम तो थी रस्म-ए-रब्त से थी मुराद
सो मेरे शहर ने ये रस्त ही उठा दी है

फ़क़त सदा ही सुना क्यूँ नज़र न आएगी
के अब तो बीच की दीवार भी गिरा दी है

तमाम उम्र न उस को किसी ने पहचाना
जो उस के मुँह पे थी चादर वो क्यँू हटा दी है

ये अब घरों में न पानी न घूप है न जगह
ज़मीं ने ‘तल्ख़’ से शहरों को बद-दुआ दी है