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रचाव / जितेन्द्र सोनी

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कांई लागै आपनै
रचीज जावै कोई कविता इयां ई
कोई आलीसान कमरां मांय
अेसी री ठंडक अर कॉफी रै घूंट साथै
का आ सोच'र कै चलो आज छुट्टी है
मांड ई नाखां दो-च्यार कवितावां?
इण भांत ई उपज्या करै कविता!
नीं भायला नीं
कविता तो उपजै
कदै बस री भीड़ मांय
धकां रै बिचाळै
कदे राशन री कतार मांय ऊभां-ऊभां
कदै न्हावतां, गुणगुणावतां
अर कदै किणी री मुळक माथै रीझ'र
का पछै किणी रै आंसूवां सूं पसीज'र
अै कदै ई, कठै ई
आ जावै है मन मांय बीज री भांत
अर कूंपळ री भांत फूट'र काळजै मांय
मंड जावै कागद री पीठ पर
कई बार टिगट रै लारले पासै
सिगरेट री पन्नी माथै
का फेर कोई रसीद
का किणी रफ पानै माथै
आडै-टेढै अर मोटै आखरां मांय।
जे संभाळ ली जावै तो
दिख जावै किणी किताब रै पानां माथै
का पछै किणी ब्लॉग का डायरी मांय।
नींस तो अै सबदां रा चितराम
दब्या ई रैय जावै
किताबां मांय
का पछै धुप जावै
जेबां मांय।
धुप जावै सो धुप जावै
पण भळै फूट पड़ै
कोई अेड़ै ई माहौल में
आपरै दूणै-चौगुणै वेग साथै।
कविता तो अजर-अमर है।