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रह-रह के कौन आ रहा दिल में, दिमाग में / डी. एम. मिश्र

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रह-रह के कौन आ रहा दिल में, दिमाग में
यादों की बर्फ़्र में कभी , सपनों की आग में।

मस्ती, बहार, खुशबू के किस्से सुना-सुना
मुझको गया वो छोड़ है काँटो के बाग में।

जब-जब मुझे लगा कि वो अब तो चला गया
फिर-फिर दिखाई दे गया दामन के दाग में।

भाषा तो रोशनी की है ये शौक़ से सुनें
देखें मगर उसे भी जो जलता चिराग में।

समझें तो क्या नहीं मिला राधा को कृष्ण में
देखें तो कुछ नहीं था बावरी के भाग में।

पतझर के बाद में हुआ ये वाक़्या अजीब
फूटी हैं कोंपले नई फिर वीतराग में।