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राग वाणी - २ / अभयानन्द

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वेद माताकि पूजाकरो पन पापहरो हर ॐकारिः ।।
वेद गणेस वेद हि ब्रह्म विष्नु वद कहाईः ।।
शिवहि वेद जिवहि वेद वेद सब सब रस वहानिः ।।
वेद माताकि पू- ।।१।।
रिगवेदकि चन्दन चढाऊ स्यान वेदकि पुरुष धढाईः ।।
यजुर्वेदकि अक्षेतु धढाऊ अथर्वेदकि धुप जराई ।।वेदमाताकि।।२।।
गायेत्रि वेद सावित्रिवेद पार्वति वेद कहाईः ।।
रिद्धि शिसि वैस्नविमे सरस्वति जोति जगाईः ।।वेदमाताकि।।३।।
चन्द्रहिवेद सूर्ज्येहि वेद चार धाम खानिः ।।
छप्पन कोटि सवहि वेद विना औरनलपानीः ।।वेदमाताकि।।४।।
दिशा विदिशा सवहि वेद वेदहि श्रीष्ट रचाईः ।।
चौध लोक सो वेद प्रचारा वेद सो अग्नि जगाईः ।।वेदमाताकि।।५।।
रिगवेदकि प्रभु जगनाथ स्वामी जजुर्वेदकि रामनाथ कहाईः ।।
स्यामवेदकि द्वारिका बाधेः अथर्वेद भुक्तिनाथ कहाईः ।।वेदमाताकि।।६।।
धर्मवेद कर्महि वेद ब्रह्मा वेद वषानिः ।।
ईतने पुजा जो नगावै कोटि जगे कहानिः ।।वेदमाताकि।।७।।
प्राणाहिनाथहि स्वामिगुरु हमारे निशिदिन सरण तुमारि ।।
कहे अभयदिल सुन्प्रेमि साधु वेदकि भेद नजानिः ।।वेदमाताकि।।८।।