रामधनी / रजनी मोरवाल

टुकड़ा-टुकड़ा बेच रही है
ख़ुद को रामधनी ।

मँहगाई की मार झेलती
छत पहले टूटी,
उस पर विधवा होकर
किस्मत की आँखे फूटी,

पूछ रहा ले कर्ज़ बिजूका
यह किसकी करनी ।

दीवारों के गिरे पलस्तर
बेसुध भय खाते,
ढाँप-ढाँप मुहँ चूल्हे के संग
बच्चे ठिठुराते,

दुःख की छाछ बिलोते हारी
काया की मथनी ।

भूखा पेट नींद के घर में
रात जगाता है,
करवट-करवट मजबूरी की
याद दिलाता है,

बिना किए गोदान तरेगी
कैसे वैतरनी ?

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