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राष्ट्रगान के लिए बच्चों के खड़े होने पर / विजय चोरमारे / टीकम शेखावत

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राष्ट्रगान के लिए खड़े होने पर
बच्चे आजकल चुलबुलाते हैं
किसी भी सुर व ताल में गाकर
नहीं पहुँचते अड़तालीस सेकेण्ड तक
इस बात का बच्चों को कोई अफ़सोस नहीं

या फिर
राष्ट्रगान के प्रोटोकोल का किसी ने पालन नहीं भी किया
तब भी उस बारे में बच्चो को कुछ नहीं कहना होता

फिर भी बच्चे आजकल
राष्ट्रगान के लिए खड़े होने पर चुलबुलाने लगते हैं

बच्चे, कक्षा में
बिन्दास पूछते हैं सवाल
राष्ट्रगान पर
राष्ट्रगान के आशय पर!

बच्चों के सवालों से घिर कर
मास्टरजी की हो जाती है बोलती बन्द
पंजाब सिन्ध गुजरात मराठा को
बारीक़ पीसते हैं बच्चे,

पंजाब कहो तो, खालिस्तान के विषय में पूछते हैं,
सिन्ध कहो तो, पकिस्तान के विषय में पूछते हैं,
गुजरात कहो तो, गोधरा के बारे में पूछते हैं,
मराठा कहो तो,
जाति-उपजाति पर पूछ्ते हैं......

विंध्य-हिमाचल यमुना-गंगा उच्चारते हुए बच्चे
हिमशिखर की तरह चमकते हैं
झिलमिलाते हैं नदी की धारा की तरह
जिस किनारे घटित हुई पूरी रामायण
उस सरयू नदी का जिक्र क्यों नहीं है राष्ट्रगान में?
यह पूछते हैं बच्चे!

राष्ट्रगान यानी,
क्या राष्ट्र के नाम अर्पित श्रद्धाँजलि होती है?
तो फिर राष्ट्रगान और श्रद्धाँजलि के लिए खड़े होने
के बीच कोई अन्तर नहीं हो सकता क्या?
ऐसा भी पूछते है बच्चे......

पत्थर तोड़ते भरी धूप में,
निराई करते भर बरसात में,
बुवाई करते,
मोट खींचते,
हल चलाते हुए,
क्या गा नहीं सकेंगे राष्ट्रगान
उन्मुक्त कण्ठ से?
ये भी पूछते हैं बच्चे.......

मास्टरजी नहीं कर पाते
बच्चों की शंकाओं का समाधान
बच्चों की आँखों में विद्रोह देख
कभी कभी डरते भी हैं मास्टरजी

'अख़बार पढ़कर, टी० वी० देखकर
बच्चे बहुत बिगड़ गए हैं
उन्हें समय रहते
ठीक करना होगा......
उन्हें देने ही होगी तेज़ धूप में खड़े रहने की सज़ा
कम से कम अड़तालीस सेकण्ड'
ले लेते हैं निर्णय, मास्टरजी !

राष्ट्रगान के लिए खड़े होने पर
बच्चे आजकल
चुलबुलाने लगते हैं....


मूल मराठी से अनुवाद — टीकम शेखावत