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रूप धरती ने धरा कितना सलोना। / रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

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रूप धरती ने धरा
कितना सलोना ।
बिछ गया खेतों में
कंचन का बिछौना ।।

भार से बल खा रहीं हैं डालियाँ,
शान से इठला रहीं हैं बालियाँ,
छा गया चारों तरफ़
सोना ही सोना ।
बिछ गया खेतों में
कंचन का बिछौना ।।

रश्मियों ने रूप कुन्दन का सँवारा,
नयन को सबके लुभाता यह नज़ारा,
धान्य से सज्जित
हुआ हरेक कोना ।
बिछ गया खेतों में
कंचन का बिछौना ।।

मस्त होकर गा रहा लोरी पवन है,
नाचता होकर मुदित जन-गण मगन है,
मिल गया उपहार में
स्वर्णिम खिलौना ।
बिछ गया खेतों में
कंचन का बिछौना ।।