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रेंगनी / कुमार वीरेन्द्र

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अब नदी से भी
का बतियाता, ऊ भी पराई लगने लगी
थी; जिन पेड़ों को बाबा की तरह अँकवारी भरता, जो केहू से नहीं बस उनसे
कहता, उनका भी साथ अनभुआर लगने लगा था; देखता, फुदकती चिरइयों
को, सोचता, 'ई भी माई, चाची, दीदी, भौजी जैसी ही, जादे
ठीक नाहीं मोह-माया'; बधार में जो लउकते
ताकते रह जाता, ई सब जब मू
जाएँगे, ई खेतवन का
का होगा

हर कवन चलाएगा, बुआई कइसे होगी

बथान पर चढ़
बैलों के गले लगता, सुहुराता और मुट्ठी-मुट्ठी
घास खिलाता; सोचता, बाबा से कहूँगा, 'देखो, भँइस बेच दो, पता नाहीं, जब हम नाहीं रहेंगे
माई-चाची तो गवत काटने से रहीं, एक अकेले आजी कतना काटेगी'; घर में क्या गाँव में भी
कवनो मेहरारू-लइकी को नाहीं देखता, मूँड़ी गाड़े गुज़र जाता, केहू बुलाए
अनसुना कर बढ़ जाता; कवनो भौजी कहती एगो सुग्गा
खोंड़िला से निकलवा लाने को, तपाक
कह पड़ता 'काहे, उसको भी
मुआना है का?'

वे चुप टकटकियाए, भकुआए रह जातीं

कि का तो हुआ एक
साँझ, बगीचे में जो बकरी चर रही थी, उसके पाठे को
पकड़ पूछता रहा, 'तोहरी माई-दीदी भी सरापती हैं ? पूछो, हम दुस्मन हैं का ?'; एक दिन आँगन
में कल पर फिसल, ऐसा गिरा, आँख तो बच गई लेकिन, भौं कट जाने से इतना ख़ून, आजी संग
सब की सब टूट-फूट पड़ीं, जब कहा, 'अब तुम लोग काहे रो रही हो, ऊ दिन तो
रेंगनी का काँट जीभ प रख सराप रही थीं--भइयवा, बेटवा, दमदा
सब मू जाएँ...'; इस पर वे का कहतीं पर आजी
ने जो कहा, इहे जान पाया, धरती
पर ई स्त्रियाँ ही हैं
जिनके

सरापने से भी अपनों की उमर बढ़ती है

बजड़ी के बूँट जइसन, फलते-फूलते हैं !