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लड़ीं बिलैया / सभामोहन अवधिया 'स्वर्ण सहोदर'

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शंकर के आँगन में आकर,
खों-खों करके कूद-फाँद कर।
आपस में दो लड़ीं बिलैयाँ,
बंधी थान पर भड़की गैया
भौंकी कुतिया, चौंकी बिटिया,
औंध गए हैं लोटे-लुटिया!
चूँ-चूँ करती चली छछुंदर,
चूहे छिपे बिलों के अंदर!
हिलीं कुंडियाँ डिगे किवाड़े,
गई चिंदिया उड़ पिछवाड़े।