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ललकार / कुमार अजय

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कांई नीं है आज थां कनै
बडौ सरकारी बंगलौ है
सिर ऊपर घूमती लाल बत्ती वाळी गाडी
गिणतबिहूणा नौकर-चाकर
चमचागीरी करतै हाजरियां री
बडी फौज है
कुरसी थारी बांदी है
थारै दस्तखतां सूं
कागद बण जावै फरमांन
थारी बातां कानून हैं
थारी समझ ई है कायदौ

अर इन्नै म्हैं
सड़क माथै ऊपाळां घूमणै वाळौ
अेक अदनौ-सौ मिनख
डावै-जीवणै सूं बगती गाडिया
जिकै नै डरावै
बडै बंगला माथै
फगत जी-हुजूरी कर सकै जिकौ
थारै नौकरां री भांत
म्हां माथै हुक्म चलावणियां री फौज है
दस्तखत म्हारा
फगत हुय सकै दरखास्तां माथै
सगळा कानून-कायदा बस
म्हां माथै ई चढाई सारू हैं
अर म्हनै मसळ-चींथ देवणौ
डावै हाथ री रम्मत है थां सारू
पण पछै ई सुण
म्हैं म्हारै कांनी सूं
थन्नै करूं खारिज
म्हारी हूंस साम्हीं
कीं नीं है थारी धूंस
रैयज्यै म्हासूं बचनै!