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लिपि-पोति देलूँ अँगनमा, अँगनमा सोहामन हे / मगही

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मगही लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

लिपि-पोति देलूँ अँगनमा[1] अँगनमा सोहामन[2] हे।
गजमोती चउका[3] पुरावल[4] सोने कलस धरी हे॥1॥
आजु हे रामजी के बियाह, चलहुँ मंगल गामन[5] हे।
जुग-जुग जीथिन[6] सीतादेइ[7] अवरो[8] सीरीराम दुलहा हे॥2॥
भोगथिन[9] अजोधेया के राज, तीनों लोक सुन्नर हे।
जुग-जुग बढ़े अहिवात, जे मंगल गावत हे॥3॥

शब्दार्थ
  1. आँगन
  2. सुहावना, शोभायमान
  3. चौका
  4. पूरण किया, अर्थात भरा
  5. गाने
  6. जीयेंगे
  7. सीता देवी
  8. और
  9. भोगेंगे