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लो, कवि का मन खोल दिखाऊँ! / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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यह देखो आँसू का मोती-
आब, कभी भी मंद न होती!
आँख गड़ा कर देखो इसमें-लो, भूगोल-खगोल दिखाऊँ!

लो देखो वासन्ती सपने-
सुन्दरतम, मेरे ये अपने!
स्वर्ण बदलियों-सा, प्राची में करते इन्हे किलोल दिखाऊँ!

यह है देखो प्यार सुनहला;
रंग-सृष्टि में उपजा पहला!
जग कंचन-सा दमक उठेगा-लो कण-कण में घोल दिखाऊँ!

गीतमालिकाएँ लो प्यारी-
यों तो हल्की, पर हैं भारी!
सूर्य-चाँ की खरी तुला पर, स्वर्ग-मुक्ति से तोल दिखाऊँ!

यह पूनों का नहीं गगन है-
भाव-भरा यह कवि का मन है!
बह जायेगा जल, थल, अम्बर लो, रस की हिल्लोल उठाऊँ!