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वनवास का गरल / विजय कुमार विद्रोही

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चलो भरें हुंकार कहें , हम जंगल के रहवासी हैं ।
काननसुत इस भूमि के,हम कहलाते वनवासी हैं ।
प्रकृति की गोदी में पलते,हम जीवन धन्य बनाते हैं ।
आदिकाल से हम संरक्षक, आदिवासी कहलाते है ।
 
यहाँ गर्भ में बेटी-बहनें , नहीं मिटाई जाती हैं ।
दौलत के लालच में बहुऐं ,नहीं जलाई जाती हैं ।
हम ही शबरीवंशज,जिसघर वो रघुनंदन आऐ थे ।
छुआछूत,सब भेद मिटाकर, जूठे फल भी खाऐ थे।
 
भूल गये आजादी के हित, इक विद्रोह हमारा था ।
शब्द भी मुंडा बिरसा का ,हमको प्राणों से प्यारा था ।
भूले अल्बर्ट एक्का अबतक,अपनी शान बढ़ाता है ।
देश पे न्योछावर हो कर के,परम वीर कहलाता है ।
 
धान्य विहीन भले रहते,पर स्वार्थ नहीं दिखलाते हम ।
मजहब के ठेकेदार बने , आतंक नहीं फैलाते हम ।
अधिकारों की जंग लड़ें, इस कारण शायद ज़िंदा हैं ।
हालत देख हमारी पावन, “उलगुलान” शर्मिंदा है ।
 
ये दौर नहीं है महुये का विज्ञान, धरे मँडराने का ।
ये दौर नहीं है जातिवाद के, दंशों से डर जाने का ।
जो छबि बनाई लोगों ने,वो छबि बदलना बाक़ी है ।
फिर “धरती-बाबा” के, पदचिन्हों पे चलना बाक़ी है ।

त्याग सकल दुष्कर्मों को,नवपीढ़ी का कल्याण करो ।
या समाज का दंश सहो,चुल्लु भर जल में डूब मरो ।