भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

वही दरबारी तरीके / पंख बिखरे रेत पर / कुमार रवींद्र

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

वही राजा -वही परजा
वही दूरी

वही ऊँचे महल
सपनों के झरोखे
राजपथ पर वही फिसलन
वही धोखे

वही दरबारी तरीके - जी-हुज़ूरी

तार सोने के
शहर पैबंद सिलते
आँख-मूँदे
बस्तियों से दिन निकलते

रोज़ जलसे में गुज़रती रात पूरी

रेशमी चेहरे
लगाये हैं जमूरे
गुंबजों की भीड़ में
सूरज अधूरे

शाह की मीनार - हैं पहरे ज़रूरी