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वा हुआ फिर दरे-मैखान-ए-गुल / नासिर काज़मी

वा हुआ फिर दरे-मैखान-ए-गुल
फिर सबा लाई है पैमान-ए-गुल

ज़मज़मारेज़ हुए अहले-चमन
फिर चरागां हुआ काशान-ए-गुल

रक्स करती हुई शबनम की परी
ले के फिर आई है नज़रान-ए-गुल

फूल बरसाए ये कहकर उसने
मेरा दीवाना है दीवान-ए-गुल

फिर किसी गुल का इशारा पाकर
चांद निकला सरे-मैखान-ए-गुल

फिर सरे-शाम कोई शोलानवा
सो गया छेड़ के अफसान-ए-गुल

आज ग़ुरबत में बहुत याद आया
ऐ वतन तेरा सनमखान-ए-गुल

आज हम ख़ाकबसर फिरते हैं
हमसे पूछे कोई अफसान-ए-गुल

कल तेरा दौर था ऐ बादे-सबा
हम हैज अब सुर्खिये-अफसान-ए-गुल

हम ही गुलशन के अमीं हैं 'नासिर'
हम सा कोई नहीं बेगान-ए-गुल।