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विदेशिनी-1 / कुमार अनुपम

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'विदेशिनी' रवीन्द्र नाथ टैगोर की रचना है। अनुपम ने उसी पृष्ठभूमि को लेकर आधुनिक समय की कविता रची है। एक ऐसी लम्बी कविता जो न केवल प्रेम के कुछ अनुपम और सघन दृश्य खींचती है, बल्कि उसके कहीं आगे जाकर हमारे समय की विसंगतियों को प्रश्नांकित करती है।

विदेशिनी
'आमी चीन्ही गो चीन्ही तुमारे
ओहो विदेशिनी'
      —रवीन्द्रनाथ टैगोर


तुम बोलती हो
तो एक भाषा बोलती है

और जब
तुम बोलती हो
मेरी भाषा में
एक नई भाषा का जन्म होता है ।