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बुझते-बुझते ख़ुद से / नारायण सुर्वे
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18:08, 9 दिसम्बर 2010
ऐसे बेईमान प्रकाश में एक बानी सुरक्षित रूप से ले जाते समय
बुझते-बुझते ख़ुद को सँवार नहीं पाया- ऐसा भी नहीं ।
'''मूल मराठी से अनुवाद : सूर्यनारायण रणसुभे'''
</poem>
अनिल जनविजय
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