भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
Changes
Kavita Kosh से
<poem>
हाथ दिया उसने मेरे हाथ में।
मैं तो वली बन गया इक एक रात मे॥
इश्क़ करोगे तो कमाओगे नाम
तोहमतें बटती नहीं खैरात में॥
इश्क़ बुरी शै सही , पर दोस्तो।दख्ल न दो तुम , मेरी हर बात में॥
हाथ में कागज़ के की लिए छतरियाँघर से न ना निकला करो बरसात में॥
रत बढ़ाया उसने न 'क़तील' इसलिए
फर्क था दौनो दोनों के खयालात में॥
</poem>