[[Category:लम्बी रचना]]
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रावण ओर मंदोदरी '''( छंद संख्या 9 17 से 10 18 )''' (9) ‘आयो! आयो! आयो सोई बानर बहोरि!’ भयो, सोरू चहुँ ओर लंका आएँ जुबराजकें। एक काढैं़ सौंज, एक धौंज करैं, ‘कहा ह्वैहै, पोच भाई’, महासोचु सुभअसमाज कें।। गाज्यो कपिराजु रघुनाथकी सपथ करि , मूँदे कान जातुधान मानो गाजें गाजकें। सहमि सुखात बातजातकी सुरति करि, लवा ज्यों लुकात, तुलसी झपेटें बाजकें।9। (10) तुलसी बल रघुबीरजू कें बालिसुतु वाहि न गनत, बात कहत करेरी -सी। ‘बकसीस ईसजू की खीस होत देखिअत, रिस काहें लागति, कहत हौं मै तेरी-सी।। चढ़ि गढ़-मढ़ दृढ़, कोटकें कँगूरें, कोपि, नेकु धका देहैं ढेलनकी ढेरी-सी।। सुनु दसमाथ! नाथ-साथके हमारे मपि हाथ लंका लाइहैं तौ रहेगी हथेरी-सी।10।
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