भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
Changes
Kavita Kosh से
शीत के संतरी उनींदे-से
बर्फ के फूल कि तमगे तन पर
. . .
मैं प्रवासी कि जा रहा हूँ आज
शून्य में टूट रही-सी आवाजआवाज़
स्वप्न का ताजमहल मिटता-सा
. . .
काँपता तीर बन गया हूँ मैं
अश्रु-हिम की फुहार मेरी है
घाटियों में पुकार मेरी पुकार मेरी है चाँद-सा शून्य में टंगा टँगा मैं आज
नीलिमा यह अपार मेरी है