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ज़िन्दगी ने सीखलीं भरना कुलांचें,
मान मन नहीं करता कि अब इतिहास बाँचें.
घुंघरुओं में बांधकर चारों दिशाएँ,
हम बिना सुर-ताल के निर्बाध नाचें.