{{KKRachna
|रचनाकार=जयशंकर प्रसाद}}
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सब जीवन बीता जाता है
धूप छाँह के खेल सदॄश
सब जीवन बीता जाता है
सब जीवन बीता जाता समय भागता है<br>प्रतिक्षण में,धूप छाँह नव-अतीत के खेल सदॄश<br>तुषार-कण में,हमें लगा कर भविष्य-रण में,आप कहाँ छिप जाता हैसब जीवन बीता जाता है<br><br>
समय भागता है प्रतिक्षण मेंबुल्ले, नहर, हवा के झोंके,<br>नव-अतीत मेघ और बिजली के तुषार-कण मेंटोंके,<br>हमें लगा कर भविष्य-रण मेंकिसका साहस है कुछ रोके,<br>आप कहाँ छिप जाता जीवन का वह नाता है<br>सब जीवन बीता जाता है<br><br>
बुल्लेवंशी को बस बज जाने दो, नहर, हवा के झोंके,<br>मेघ और बिजली के टोंकेमीठी मीड़ों को आने दो,<br>किसका साहस है आँख बंद करके गाने दोजो कुछ रोके,<br>जीवन का वह नाता है<br>सब जीवन बीता जाता हमको आता है<br><br>
वंशी को बस बज जाने दो,<br>मीठी मीड़ों को आने दो,<br>आँख बंद करके गाने दो<br>जो कुछ हमको आता है<br><br> सब जीवन बीता जाता है.<br>