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|रचनाकार=शेर सिंह नाज़ 'देहलवी'
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ज़िंदगी नाम है जिस चीज़ का क्या होती है
चलती फिरती ये ज़माने की हवा होती है

सैर दुनिया की न कुछ याद-ए-ख़ुदा होती है
उम्र इन्हीं झगड़ों में ताराज-ए-फ़ना होती है

रूह जब क़ालिब-ए-ख़ाकी से जुदा होती है
किस को मालूम कहाँ जाती है क्या होती है

फ़िक्र-ए-दुनिया से सिवा हो जिस उक़्बा का ख़याल
वो तबीअत ही ज़माने से जुदा होती है

दिल-ए-पुर-ग़म अभी बन जाए दवा-ए-तस्कीन
वो नज़र डाल जो मानूस-ए-वफ़ा होती है

सादिकुल-क़ौल की पहचान यही है ऐ ‘नाज़’
दिल में डर होता है आँखों में हया होती है
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