1,456 bytes added,
15:42, 17 अगस्त 2013 {{KKGlobal}}
{{KKRachna
|रचनाकार=मोहम्मद रफ़ी 'सौदा'
}}
{{KKCatGhazal}}
<poem>
गुल फेंके है औरों की तरफ़ बल्कि समर भी
ऐ ख़ाना-बर-अंदाज़-ए-चमन कुछ तो इधर भी
क्या ज़िद है मेरे साथ ख़ुदा जाने वगरना
काफ़ी है तसल्ली को मेरी एक नज़र भी
ऐ अब्र क़सम है तुझे रोने की हमारे
तुझ चश्म से टपका है कभू लख़्त-ए-जिगर भी
ऐ नाला सद अफ़सोस जवाँ मरने पे तेरे
पाया न तनिक देखने तीं रू-ए-असर भी
किस हस्ती-ए-मौहूम पे नाज़ाँ है तू ऐ यार
कुछ अपने शब ओ रोज़ की है तुज को ख़बर भी
तन्हा तेरे मातम में नहीं शाम-ए-सियह-पोश
रहता है सदा चाक गिरेबान-ए-सहर भी
‘सौदा’ तेरी फ़रीयाद से आँखों में कटी रात
आई है सहर होने को टुक तू कहीं मर भी
</poem>
Delete, Mover, Protect, Reupload, Uploader