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|रचनाकार='फना' निज़ामी कानपुरी
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इक तिश्ना-लब ने बढ़ कर जो साग़र उठा लिया
हर बु-उल-हवस ने मय-कदा सर पर उठा लिया

मौजों के इत्तिहादद का आलम ने पूछिए
क़तरा उठा और उठ के समंदर उठा लिया

तरतीब दे रहा था मैं फ़हरिस्त-ए-दुश्मनान
यारों ने इतनी बात पे ख़ंजर उठा लिया

मैं ऐसा बाद-नसीब की जिस ने अज़ल के रोज़
फेंका हुआ किसी का मुक़द्दर उठा लिया
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