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|रचनाकार=‘खावर’ जीलानी
}}
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<poem>
कुछ बचा ले अभी आँसू मुझे रोने वाले
सानहे और भी हैं रू-नुमा होने वाले
वक़्त के घाट उतर कर नहीं वापस लौटे
दाग़ मल्बूस मह ओ महर के धोने वाले
दाएम आबाद रहे दार-ए-फ़ना के बासी
फ़िक्र में रूह-ए-बक़ायाब सुमूने वाले
थथराती रहे अब ख़्वाह हमा-वक़्त ज़मीं
सो गए ख़ाक-ए-अबद ओढ़ के सोने वाले
जिस पे भी पाँव धरा मैं ने उसी नाव में
आए आसार नज़र ख़ुद को डुबोने वाले
अब लिए फिरता है क्या दामन सद-चाक अपना
क्या हुए अब वो तेरे सीने पिरोने वाले
जा निकलता है अचानक वहीं रास्ता मेरा
दर प-ए-पा हों जहाँ ख़ार चुभोने वाले
गर्द है हाथ में उन के मेरी किश्त-ए-ज़र-ख़ेज़
ख़ार-ओ-ख़स से जो अलावा नहीं बोने वाले
ये भी इक तुरफ़ा तमाशा है की हैं अँधियारे
रेशा-ए-शब में सितारों को पिरोने वाले
कर गए ख़ुश्क भरी झील तअस्सुफ़ के कँवल
सूख कर काँटा हुए रात भिगोने वाले
दे गया है हमें अहद-ए-मरासिम उस का
उस ख़ज़ाने को नहीं हम नहीं खोने वाले
</poem>
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|रचनाकार=‘खावर’ जीलानी
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कुछ बचा ले अभी आँसू मुझे रोने वाले
सानहे और भी हैं रू-नुमा होने वाले
वक़्त के घाट उतर कर नहीं वापस लौटे
दाग़ मल्बूस मह ओ महर के धोने वाले
दाएम आबाद रहे दार-ए-फ़ना के बासी
फ़िक्र में रूह-ए-बक़ायाब सुमूने वाले
थथराती रहे अब ख़्वाह हमा-वक़्त ज़मीं
सो गए ख़ाक-ए-अबद ओढ़ के सोने वाले
जिस पे भी पाँव धरा मैं ने उसी नाव में
आए आसार नज़र ख़ुद को डुबोने वाले
अब लिए फिरता है क्या दामन सद-चाक अपना
क्या हुए अब वो तेरे सीने पिरोने वाले
जा निकलता है अचानक वहीं रास्ता मेरा
दर प-ए-पा हों जहाँ ख़ार चुभोने वाले
गर्द है हाथ में उन के मेरी किश्त-ए-ज़र-ख़ेज़
ख़ार-ओ-ख़स से जो अलावा नहीं बोने वाले
ये भी इक तुरफ़ा तमाशा है की हैं अँधियारे
रेशा-ए-शब में सितारों को पिरोने वाले
कर गए ख़ुश्क भरी झील तअस्सुफ़ के कँवल
सूख कर काँटा हुए रात भिगोने वाले
दे गया है हमें अहद-ए-मरासिम उस का
उस ख़ज़ाने को नहीं हम नहीं खोने वाले
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