पग-पग पर सैनिक सोता है, पग-पग सोते वीर,
कदम-कदम पर यहाँ बिछा है ज्ञानपीठ गंभीर।
यह गह्वर प्राचीन अस्तमित गौरव का खॅंडहर खँडहर है!सूखी हुई सरित् सरिता का तट यह उजड़ा हुआ नगर है।
एक-एक कण इस मिट्टी का मानिक है अनमोल।
कल्पने! धीरे-धीरे बोल!
२
यह खॅंडहर खँडहर उनका जिनका जग
कभी शिष्य और दास बना था,
यह खॅंडहर खँडहर उनका, जिनसे
भारत भू-का इतिहास बना था।
दूसरा देख रहे क्या वहाँ? शंख जय का वह उठा पुकार,
मगधराज का शुरू हो गया, स्यात्स्यात्, विजय-दरबार!
चौथा हाँ, राजा जा चुके, जा चुके हैं चाणक्य प्रवीण,