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बारिश ने पहाड़ों को उनका यौवन लौटा दिया है
दो पास खड़े पहाड़ हरे दुपट्टे के नीचे तुम्हारे वक्ष हैं
गोरे पानी से भरी झील तुम्हारी नाभि है
और मैं नैतिकता के पिंजरे में फड़फड़ाता हुआ तोता हूँजिसे ये रटाया गया है कि गोरे पानी में नहाने से आत्मा दूषित हो जाती है
प्रेम का रंग हरा है
हर बादल को कहीं न कहीं बरसना पड़ता है
मगर यह भी सच हैसारी बरसातें बारिशें बादलों से नहीं होती
भीगी पहाड़ी सड़कें तुम्हारे शरीर के गीले वक्र हैं
हरा सबके भीतर होता है
हरा होने के लिए सिर्फ़ हवा, बारिश और धूप चाहिए
 
'''क्षेपक:'''
बरसात में गिरगिट भी हरा हो जाता है
उससे बचकर रहना
सारी नदियाँ इस मौसम में तुम्हारे काले बालों से निकलती हैं
फिर भी मेरी प्यास नहीं बुझती
हर बारिश में कितने ही पहाड़ आत्महत्या कर लेते हैं
ओह! तुम बारिश और पहाड़जान लेने के लिए और क्या चाहिए?
</poem>
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