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|रचनाकार=जाँ निसार अख़्तर
}}
[[Category:गज़ल]]{{KKCatGhazal}}<poem>इसी सबब से हैं शायद, अज़ाब जितने हैंझटक के फेंक दो पलकों पे ख़्वाब जितने हैं
इसी सबब वतन से हैं शायदइश्क़, अज़ाब जितने हैं<br>ग़रीबी से बैर, अम्न से प्यारझटक के फेंक दो पलकों पे ख़्वाब सभी ने ओढ़ रखे हैं नक़ाब जितने हैं<br><br>
वतन से इश्क़, ग़रीबी से बैर, अम्न से प्यार<br>सभी ने ओढ़ रखे हैं नक़ाब जितने हैं<br><br> समझ सके तो समझ ज़िन्दगी की उलझन को<br>
सवाल उतने नहीं है, जवाब जितने हैं
</poem>