भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

Changes

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बेवकूफ गुडिया / श्रीनाथ सिंह

1,532 bytes added, 08:26, 5 अप्रैल 2015
'{{KKRachna |रचनाकार=श्रीनाथ सिंह |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatBaalKavita...' के साथ नया पृष्ठ बनाया
{{KKRachna
|रचनाकार=श्रीनाथ सिंह
|अनुवादक=
|संग्रह=
}}
{{KKCatBaalKavita}}
<poem>
ऊब गई हूँ गुड़िया से मैं,
कहा नहीं यह करती है।
कितना ही आँखे दिखलाऊँ,
कुछ भी किन्तु न डरती है।
नहीं शहूर जरा भी इसको,
कहने को है पढ़ी लिखी।
कल दुपहर जब खाने बैठी,
कपड़ों पर ली गिरा कढ़ी।
पड़ा मुझी को धोना उनको,
बड़ी दूर से टब लाकर।
पास उसी के लकड़ी पर वह,
गुड़िया भी बैठी आकर।
जब मैं कपड़े लगी सुखाने,
छप छप कुछ बोला जल में।
पीछे फिर कर देखा तो,
पाया उसको गायब पल में।
भीग गई रेशम की साड़ी,
गालों पर काजल फैला।
मैले पानी में डुबकी खा,
सारा बदन हुआ मैला।
मर जाती यदि दौड़ न मुन्नी,
खींच उसे लेती टब से।
देखो इस गुड़िया के पीछे,
परेशान हूँ मैं कब से।
</poem>