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सहेली / श्रीनाथ सिंह

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<poem>
बनी न रह अनजान सहेली,
अपने को पहचान सहेली।
गहने धर दे अलमारी में,
छिदा न नाहक कान सहेली।
तेरी सेवा का भूखा है,
सारा हिंदुस्तान सहेली।
उठ उठ चतुर सुजान सहेली,
अपने को पहचान सहेली।
पड़ी न रह दिन भर बिस्तर में,
मूरख बन कर बैठ न घर में।
सुन तो क्या कहता है भैया,
चल चल मेरे साथ समर में।
रख भैया का मान सहेली,
संभले हिंदुस्तान सहेली।
</poem>