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|रचनाकार=हनीफ़ साग़र
}}
[[Category:गज़ल]]{{KKCatGhazal}}<poem>कहता हूँ महब्बत है ख़ुदा सोच समझकरये ज़ुर्म अगर है तो बता सोच समझकर
कहता हूँ महब्बत है ख़ुदा कब की मुहब्बत ने ख़ता सोच समझकर<br>ये ज़ुर्म अगर है तो बता कब दी ज़माने ने सज़ा सोच समझकर<br><br>
कब वो ख़्वाब जो ख़ुशबू की मुहब्बत ने ख़ता सोच समझकर<br>तरह हाथ न आएकब दी ज़माने ने सज़ा उन ख़्वाबों को आंखो में बसा सोच समझकर<br><br>
वो ख़्वाब जो ख़ुशबू की तरह हाथ कल उम्र का हर लम्हा कही सांप आए<br>बन जाएउन ख़्वाबों को आंखो में बसा मांगा करो जीने की दुआ सोच समझकर<br><br>
कल उम्र का हर लम्हा कही सांप न बन जाए<br>आवारा बना देंगे ये आवारा ख़यालातमांगा करो जीने की दुआ इन ख़ाना बदोशों को बसा सोच समझकर<br><br>
आवारा बना देंगे ये आवारा ख़यालात<br>आग जमाने में तेरे घर से न फैलेइन ख़ाना बदोशों दीवाने को बसा महफ़िल से उठा सोच समझकर<br><br>
ये आग जमाने में तेरे घर से न फैले<br>दीवाने को महफ़िल से उठा सोच समझकर<br><br> भर दी जमाने ने बहुत तलख़ियां इसमें <br>'साग़र' की तरफ़ हाथ बढा सोच समझकर<br><br/poem>
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