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'''(घनाक्षरी)'''
अति अनियारे मानों सान दै सुधारे,
ऐसे अपराधी देख अगम अगाधी यहै,
बार बार बोरे याते लाल लाल डोरे भये,
घाइक घनेरे दुखदाइक हैं मेरे नित,
पट चाहे तन पेट चाहत छदन मन
तेरोई कहाय कै 'रहीम' कहै दीनबंधु
पेट भर खायो चाहे, उद्यम बनायो चाहे,
जीविका हमारी जो पै औरन के कर डारो,
बड़ेन सों जान पहिचान कै रहीम कहा,
सीत-हर सूरज सों नेह कियो याही हेत,
नीरनिधि माँहि धस्यो शंकर के सीस बस्यो,
बड़ो रीझिवार है, चकोर दरबार है,
मोहिबो निछोहिबो सनेह में तो नयो नाहिं,
तन मन रावरे सो मतों के मगन हेतु,
चित लाग्यो जित जैये तितही 'रहीम' नित,
जान हुरसी उर बसी है तिहारे उर,
गये गेहहिं त्यागि के ताही समै सु निकारि पिता बनवास दिया 1।
कहे बीच 'रहीम' रर्यो न कछू जिन कीनो हुतो बिनुहार हिया ।हिया।बिधि यों न सिया रसबार सिया करबार सिया पिय सार सिया ।।6।। दीन चहैं करतार जिन्हें सुख सो तो 'रहीम' टरै नहिं टारे ।उद्यम पौरुष कीने बिना धन आवत आपुहिं हाथ पसारे ।।दैव हँसे अपनी अपनी बिधि के परपंच न जात बिचारे ।बेटा भयो वसुदेव के धाम औ दुंदुभि बाजत नंद के द्वारे ।।7।। पुतरी अतुरीन कहूँ मिलि कै लगि लागि गयो कहुँ काहु करैटो ।हिरदै दहिबै सहिबै ही को है कहिबै को कहा कछु है गहि फेटो ।।सूधे चितै तन हा हा करें हू 'रहीम' इतो दुख जात क्यों मेटो ।ऐसे कठोर सों औ चितचोर सों कौन सी हाय घरी भई भेंटो ।।8।।सिया॥6॥
'''(पद)'''छबि आवन मोहनलाल की ।की।काछनि काछे कलित मुरलि कर पीत पिछौरी साल की ।।की॥बंक तिलक केसर को कीने दुति मानो बिधु बाल की ।की।बिसरत नाहिं सखि मो मन ते चितवनि नयन बिसाल की ।।की॥नीकी हँसनि अधर सधरनि की छबि छीनी सुमन गुलाल की ।की।जल सों डारि दियो पुरइन पर डोलनि मुकता माल की ।।की॥आप मोल बिन मोलनि डोलनि बोलनि मदनगोपाल की ।की।यह सरूप निरखै सोइ जानै इस 'रहीम' के हाल की ।।12।।की॥12॥
कमल-दल नैननि की उनमानि ।उनमानि।बिसरत नाहिं सखी मो मन ते मंद मंद मुसकानि ।।मुसकानि॥यह दसननि दुति चपला हूते महा चपल चमकानि ।चमकानि।बसुधा की बसकरी मधुरता सुधा-पगी बतरानि ।।बतरानि॥चढ़ी रहे चित उर बिसाल को मुकुतमाल थहरानि ।थहरानि।नृत्य-समय पीतांबर हू की फहरि फहरि फहरानि ।फहरानि।अनुदिन श्री वृन्दाबन ब्रज ते आवन आवन जाति ।जाति।अब 'रहीम 'चित ते न टरति है सकल स्याम की बानि ।।13।।बानि॥13॥</poem>