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भर दिन
देवदार के पेड की तरह
दर्द से निशब्द निःशब्द सुबक सुबक कर रो कर
भर दिन
कुकुरमुत्ने कुकुरमुत्ते की तरह
धरती और आकाश की विशालता से दूर
एक छोटी-सी जगह पे अपना पैर धँसाकर
शाम को
जब नेपाल सिकुडकर काठमांडू
काठमान्डु काठमांडु सिकुडकर नयी नयाँ सडक
और नयाँ सडक सिकुडकर - अनगिनत इन्सानों के पैरों से कुचलाकर,
टुकडों पे बँटकर
घूम ही रही है पृथ्वी - पहले की ही तरह
सिर्फ मैं अनभिज्ञ हूँ
अगलबगल अगल बगल के बदलाव से,
दृश्यों से
खुशियों से,
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