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मुक्तक-47 / रंजना वर्मा

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हाथों पर है भाग्य विधाता लिख जाता
वही मिलेगा जो भी कर्म करो कर से।।
 
निवारो निवारो सकल कामना को
किसी को न अब वैर की राह भाये
मिटा दो मिटा दो विषम भावना को।।
 
जहाँ पर हो अँधेरा रौशनी उपहार कर देना
मिटाना है अगर तो तुम दिलों के द्वेष को मारो
अगर तुम से बने तो शत्रुता संहार कर देना।।
 
मुहब्बत है अजब जज़्बा गजब इस की कहानी है
है इक एहसास जाने कब किसी के दिल मे पैदा हो
कहीं पर्वत की ऊँचाई कहीं दरिया का पानी है।।
 
झलक एक मीरा ने पायी उस की सपने में
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