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85उड़ा है पाखीसप्त सिन्धु के पार लौटे न लौटे86घायल डैनेअश्रू नयन-कोरकोई न देखे ।87सपने देखे-कल्याण सदा करूँसहे प्रहार ।88पोर-पोर में जब भरा ज़हरपी न सकोगे ।89विक्षिप्त है वोजनहित जो करेदु:ख ही भरे ।90तुतली बोली-दिल एक बनाओसाथ ले जाओ।91'''रोती सजनी'''ग़ुमसुम रजनीढूँढके हारी।92निशि-वासरआशीष बाँटे लाखोंशापित हुए ।93द्वेष की आगजीभरके जलाएकोई न बचे ।94जीवन भर जिनके लिए जागेवे थे अभागे ।95विवेक-शून्यनिपट अन्धे लोगसूर्य को कोसें। 96सारे सम्बन्धसिर्फ़ कर्मों का भोगभोगना पड़े ।
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