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नेह का वरदान वो ईश्वर दिया।आज कितना दर-ब-दर है आदमी।
बेमुरौव्वत बेवफ़ा तो हम कत्ल पर भी उफ तलक करता नहीं,चाक-दामन तुमने लेकिन कर दिया।हो गया अब बेअसर है आदमी।
जब घिरी काली घटा झूले लगेग़म छुपाने के हज़ारों रास्ते,दर्द तनहाई ने दिल में भर दिया।जा रहा जाने किधर है आदमी।
सुरमई थी शाम हम जब थे मिले,ख़्वाब मोहतरम कहने लगा शैतान को जैसे किसी ने पर दिया। माँगती हो दिल क्या मुझसे ऐ ‘मृदुल’,मैने, लो उल्फत सोच में अपना सर दिया।बिल्कुल शिफर है आदमी।
बेरुखी जब मिल रही सौगात में,
ढूंढ़ता क्यों हम सफर है आदमी।
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