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Kavita Kosh से
अपने वेग से तुम्हारी सीने पर
अमिट हस्ताक्षर करूँगी
कुछ भी हो जाए; हठ है मेरी मेरा कि
इन चट्टानों पर गहरी 'नदी' लिखूँगी।
किनारे को लगा कि