भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

Changes

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मनदीप कौर-1 / गिरिराज किराडू

17 bytes added, 12:29, 9 सितम्बर 2008
सामने हवा होती है
 
और दूर तक फैली पृथ्वी
 
अपने को पूरा झोंककर मैं दौड़ती हूँ
 
हवा के ख़िलाफ़
 
और किसी प्रेत निश्चय से लगाती हूँ छलांग, उसी हवा में
 
मानो उड़कर इतनी दूर चली जाऊँगी
 
कि ख़ुद को नज़र नहीं आऊँगी
 
पर आ गिरती हूँ इसी पृथ्वी पर
 
इतनी पास मानो यहीं थी हमेशा -
 
ऎसी ख़फ़गी होती है
 
अपने आप से
 
और इस मिट्टी से !
 
अब तक इतना ही पता चला हैअपने से खफा हुए बिना नहीं हूँ मैं
 
मुझे नहीं पता ठीक से
 
पर अपने से दोस्ती करने के लिए
 
तो नहीं ही लिखती हूँ मैं।
 
कविता भी एक असफल छलांग है
 
और मैं खफा हूँ इससे भी
Delete, Mover, Protect, Reupload, Uploader
54,039
edits