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कभी शुऊ'र कभी दिल कभी सुख़न महके कहो वो शे'र कि दुनियामिज़ाज-ए-फ़िक्रमुस्तक़िल देना शुऊर--फ़न महके मोअतबर देना झुका पाए न जिस को वक़्त का तूफ़ाँ वो सर देना
अता हमें भी जो हो जाए 'मीर' का अंदाज़ मुझे उम्र-ए-ख़िज़र देना कि उम्र-ए-मुख़्तसर देना तो लफ़्ज़ लफ़्ज़ से मा'नी का पैरहन महके मिरे अफ़्कार लेकिन ज़िंदा-ए-जावेद कर देना
रहूँ ख़मोश तो फूलों को नींद आ जाए जो उट्ठे सम्त-ए-माज़ी वो नज़र मेरा नहीं हासिल पढ़ूँ पस-ए-दीवार-ए-मुस्तक़बिल जो शे'र तो लफ़्ज़ों का बाँकपन महके देखे वो नज़र देना
लरज़ते होंटों की वो गुफ़्तुगू तो याद नहीं मुजाहिद जंग के मैदाँ को जाए जिस तरह घर से बस इतना याद है बरसों लबये मंज़र ज़ेहन में रख कर मुझे इज़्न--दहन महके सफ़र देना
दबी हुई अगर इस रज़्म-गाह-ए-दहर में जीना ही है जो सदियों से ग़म की चिंगारी मुझ को भड़क उठे तो ख़यालों की अंजुमन महके फिर इन यूरिशों में ज़िंदा रहने का हुनर देना
कभी तो ऐसा ज़माना भी आए ऐ सिवा हो जाए जिस से अज़्मत-ए-दीदा-वरी 'गौहर' मोहब्बतों की फ़ज़ा से मिरा वतन महके नज़र देना तो यारब फिर मुझे ऐसी नज़र देना
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